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दुर्भाग्य

  • Writer: Shreyas Khopkar
    Shreyas Khopkar
  • Dec 20, 2018
  • 1 min read

अटल सा खड़ा हुआ, 

सुस्त सा पड़ा हुआ,

संसार की झोंकी धूल आँखों में लिए,

अपने लबों को सिये,

चीखता-चिल्लाता कराहता हुआ,

कैसा है ये अंधकार का घेरा

उफ़! ये तो दुर्भाग्य है मेरा। 

अभी शुरुआत शुरुआत में,

इसमें शराब सा था नशा,

अब कैसे पलटी काया,

हुई इसकी ऐसी दुर्दशा,

कभी ये एक ठंडा पवन का झोंका था,

सुहानी यादों का अदृश्य-सा झूला था,

अब तो सिर्फ अँधेरी रातें हैं,

नहीं किस्मत में उजला सवेरा,

उफ़! ये तो दुर्भाग्य है मेरा। 

बरसों से इन हस्तरेखाओं को,

घूरता चला आ रहा हूँ,

मन ही मन में सपने सजा रहा हूँ,

परन्तु ये भयानक भवँर कैसा है,

कैसा है इसमें ये अँधेरा,

उफ़! ये तो दुर्भाग्य है मेरा।

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